Blog: डर के आगे जीत है!

कोरोना की दूसरी लहर को देखते हुए वैक्सीन लगवाने के लिए लोगों को आगे आना पड़ेगा. सरकार को भी व्यापक तौर पर वैक्सीनेशन मुहिम चलानी होगी.

Blog: डर के आगे जीत है!
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ऐसे लोग जो इंटरनेट बैंकिंग इस्तेमाल करने में खुद को असहज पाते हैं, जरा सोचिए उनके लिए डिजिटल ईकोसिस्टम में अपने निजी ब्योरे भरना कितना झंझट वाला काम होगा. लेकिन, नियमों का पालन करने वाले एक शख्स के तौर पर मेरे लिए वैक्सीन के लिए सेंटर पर वॉक-इन में जाना कतई गवारा नहीं हो सकता था. ऐसे में सही तरीका यही है कि सहयोग और साथ मिलकर इस काम को किया जाए. आइडिया इस जंग को मिलकर जीतने का है.

दस्तावेज अपलोड करने की उलझन नहीं

कोविन पर आपका स्वागत है! यह एक सरकारी प्लेटफॉर्म है जो कि वैक्सीन लगवाने के लिए आपका सबसे शुरुआती साथी बनता है. ये प्लेटफॉर्म आसान है. सबसे बड़ी बात- ये आपकी ज्यादा निजी जानकारियां नहीं मांगता. इसमें कोई दस्तावेज अपलोड नहीं करना पड़ता. डॉक्युमेंट के साइज और शेप की दिक्कतें वाकई डराने वाली होती हैं.

एक मोबाइल नंबर से चार रजिस्ट्रेशन मुमकिन

हां, आपको आधार की जरूरत पड़ती है. बस, इसके बाद ये चुटकियों का काम है. एक मिनट के भीतर आपके सामने एक विंडो खुल जाती है जो कि आपको नजदीकी वैक्सीनेशन सेंटर दिखाने लगती है. एक मोबाइल नंबर से आप चार लोगों को जोड़ सकते हैं. यानी मेरे साथ ही मेरी पत्नी का भी रजिस्ट्रेशन हो गया.

अब इसमें 45 साल से ज्यादा वालों का एक फिल्टर भी लग गया है. इससे 45 साल से ऊपर के लोग भी अब वैक्सीन लगवा पाएंगे. प्लेटफॉर्म से आने वाले रजिस्ट्रेशन मैसेज के साथ ही अब तैयारी थी 1 अप्रैल को वैक्सीन लगवाने की.

वैक्सीन की तारीख और बेचैनी

1 अप्रैल. इस तारीख का अपना एक महत्व है. मैं सुबह जल्दी उठा. मन में कई तरह की शंकाएं थीं. निश्चित तौर पर कोविन पर हर सवाल के जवाब तो नहीं मिलते. ऐसे में मैंने कुछ दोस्तों को फोन घुमा दिए और अपनी बेचैनी पर काबू पाने की कोशिश की.

कोविशील्ड बेहतर है या कोवैक्सीन? सरकारी अस्पताल सही रहेगा या निजी हॉस्पिटल? खैर, इस बारे में विकल्प तो पहले ही चुना जा चुका था, ऐसे में मैंने ज्यादा अकादमिक बहस में न जाने की कोशिश की. हालांकि, मैंने हर जगह से इनपुट लेने की इच्छा पूरी कर ली थी.

आसान प्रक्रिया

आखिरकार, अब वसुंधरा एनक्लेव के धर्मशिला हॉस्पिटल जाने का वक्त आ गया था. ये मेरे घर से ज्यादा दूर नहीं है, ऐसे में मैं वक्त पर वहां पहुंच गया. मैं नर्वस हो रहा था. लेकिन, मैं यह देखकर काफी आश्चर्यचकित था कि हॉस्पिटल ने वैक्सीनेशन के लिए मुख्य हॉस्पिटल से अलहदा एक ब्लॉक तैयार किया था.

पूरी प्रक्रिया काफी आसान थी. आपका आधार ही आपका पासपोर्ट है और पेमेंट के बाद आप वैक्सीनेशन के कई चैंबर्स में से एक के दरवाजे पर पहुंच जाते हैं. कुछ मिनटों के भीतर ही आप एक युवा नर्स का अभिवादन करते हैं. जब तक आप अपने अंदर हिम्मत जुटाते हैं, नर्स वैक्सीन लगाने की तैयारी कर लेती हैं. आपको सुई लगाते वक्त नर्स के चेहरे पर मुस्कान बिखरी होती है.

वैक्सीन लग चुकी थी. अब आधे घंटे तक ऑब्जर्वेशन में रहने के लिए एक वेटिंग हॉल में आपको जाना होता है. सामाजिक दूरी के तहत लोग दूर-दूर बैठे हैं और ऐसे में मैंने अपनी पत्नी को व्हॉट्सएप करके पूछा कि उन्हें ठीक से वैक्सीन लग गई है?

मेरी बांह में हल्का दर्द हो रहा था. अटेंडेंट ये देखता है कि आपको कोई दिक्कत तो नहीं हो रही है. आधे घंटे बाद हम घर वापस लौट चले. हां, इसके पहले हमने, जैसी कि परंपरा चल पड़ी है, एक सेल्फी भी ले ली.

नकारात्मकता पर जीत

ये जश्न का मौका था. पहला ये बेवजह की नकारात्मकता पर जीत थी. हम में से सभी पर किसी न किसी स्तर पर ये नकारात्मकता हावी होती है. वायरस के खिलाफ जंग जीतने के लिए एक और डोज की जरूरत है और सतर्कता भी जरूरी है.

ज्यादातर भारतीय अभी भी वैक्सीन को लेकर हिचक रहे हैं. भारत ने पोलियो को मिटाने के लिए जबरदस्त काम किया है, लेकिन अगर वैक्सीन विरोधी सोच न होती तो इस पर काफी पहले जीत मिल सकती थी.

ये नकारात्मकता अभी भी बनी हुई है. ऐसे वक्त पर जबकि वायरस ने एक बार फिर वापसी की है, भारत को व्यापक पैमाने पर वैक्सीनेशन की हर मुमकिन कोशिश करनी चाहिए.

झिझक को दूर भगाइए और वैक्सीन लगवाइए.