
मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) वी अनंत नागेश्वरन ने बृहस्पतिवार को कहा कि अगर भारत विनिर्माण, निर्यात प्रतिस्पर्धा और प्रक्रिया सुधारों पर जोर देता है तो आने वाले कुछ वर्षों में देश की संभावित आर्थिक वृद्धि दर 7.5 प्रतिशत तक पहुंच सकती है।
संसद में पेश की गई आर्थिक समीक्षा 2025-26 में देश की संभावित वृद्धि दर के अनुमान को तीन साल पहले अनुमानित 6.5 प्रतिशत से बढ़ाकर सात प्रतिशत कर दिया गया है।
नागेश्वरन ने संसद में आर्थिक समीक्षा पेश होने के बाद संवाददाताओं के साथ बातचीत में कहा, ‘यदि हम विनिर्माण और निर्यात में प्रतिस्पर्धी क्षमता हासिल करने में सफल रहते हैं और भूमि एवं लागत सब्सिडी में प्रक्रियागत सुधारों को आगे बढ़ाते हैं और विनिर्माण लागत को भी कम कर लेते हैं तो अगले कुछ वर्षों में संभावित वृद्धि दर 7.5 प्रतिशत या आठ प्रतिशत तक पहुंच सकती है।’
उन्होंने कहा कि तीन वर्ष पहले पेश की गई आर्थिक समीक्षा में भारतीय अर्थव्यवस्था की अधिकतम संभावित वृद्धि दर 6.5 प्रतिशत आंकी गई थी, लेकिन सुधारों की रफ्तार तेज होने से मध्यम अवधि में यह सालाना सात-आठ प्रतिशत तक बढ़ सकती है।
नागेश्वरन ने कहा कि पिछले तीन वर्षों में मध्यम अवधि की वृद्धि से जुड़े कई क्षेत्रों में सुधारों की रफ्तार मजबूत हुई है।
आर्थिक समीक्षा के मुताबिक, उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) नियमों को उदार बनाने और लॉजिस्टिक सुधार जैसे विनिर्माण-केंद्रित उपायों से उत्पादन क्षमता के सृजन को समर्थन मिला है। इन प्रयासों को भौतिक और डिजिटल अवसंरचना में सतत सार्वजनिक निवेश का भी सहारा मिला है, जिससे प्रभावी पूंजीगत व्यय जीडीपी के करीब चार प्रतिशत तक पहुंच गया है।
समीक्षा में कहा गया कि कर कानूनों के सरलीकरण और नियामकीय सुधारों के लिए केंद्र एवं राज्यों की भागीदारी वाली उच्च-स्तरीय समितियों के गठन से नियामकीय स्पष्टता और स्थिरता की दिशा में संकेत मिलता है।
आर्थिक समीक्षा ने अगले वित्त वर्ष के लिए जीडीपी वृद्धि 6.8 से लेकर 7.2 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है, जो सुधारों के समेकित प्रभावों पर आधारित है। यह अनुमान चालू वित्त वर्ष के लिए 7.4 प्रतिशत वृद्धि के आकलन से थोड़ा कम है।
घरेलू मुद्रा में हाल की तेज गिरावट के बीच समीक्षा कहती है कि रुपये का मौजूदा मूल्यांकन भारत की मजबूत आर्थिक बुनियाद को पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं करता है और रुपया अपनी वास्तविक क्षमता से नीचे है।
हालांकि, कम मूल्यांकन वाला रुपया अमेरिकी शुल्कों के असर को आंशिक रूप से संतुलित करता है और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों से फिलहाल मुद्रास्फीति बढ़ने का भी जोखिम नहीं है। लेकिन रुपये में कमजोरी से निवेशकों में कुछ हिचक जरूर देखी जा रही है।
आर्थिक समीक्षा के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की वृद्धि संभावनाएं अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के अनुमानों से बेहतर हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने 6.4 प्रतिशत जबकि विश्व बैंक एवं एशियाई विकास बैंक (एडीबी) ने 6.5 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान जताया है।