
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का ग्रीनलैंड पर रुख लगभग हर दिन बदलता रहता है, वह कभी बलपूर्वक कब्जा करने की धमकी देते हैं तो कभी ऐसा न करने का आश्वासन। लेकिन उनका यह दृढ़ विश्वास है कि आर्कटिक द्वीप अमेरिका के लिए सामरिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
इस सप्ताह दावोस शिखर सम्मेलन में राष्ट्रपति के भाषण के कुछ ही घंटों के भीतर, ऐसी खबरें प्रकाशित होने लगीं कि वाशिंगटन और कोपेनहेगन ने चुपचाप अमेरिका को नये सैन्य ठिकानों के लिए ग्रीनलैंड के छोटे, दूरस्थ भू-भाग देने पर चर्चा की थी। हालांकि, इसकी पुष्टि नहीं हुई, सब अफवाहें थीं, लेकिन जिस तरह से अटकले फैलीं उसने बहुत कुछ कह दिया।
जो कभी ट्रंप की सियासी नाटक प्रतीत होता था, वह अचानक एक वास्तविक भू-राजनीतिक चाल प्रतीत होने लगा। यह इस बात का भी संकेत है कि आर्कटिक क्षेत्र में शक्ति प्रदर्शन की होड़ अब बाह्य अंतरिक्ष की राजनीति में भी अपना प्रभाव डाल रही है।
यह सब बहुत तेजी से हुआ। अमेरिका द्वारा डेनमार्क से ग्रीनलैंड खरीदने की संभावना (जो 2019 में फिर से सामने आई) को पहले हंसी-मजाक में की जाने वाली चर्चा के तौर पर लिया गया था।
लेकिन इन मजाकिया चर्चा के पीछे एक बढ़ती हुई बेचैनी छिपी थी कि ट्रंप प्रशासन का ग्रीनलैंड के प्रति जुनून ‘‘पश्चिमी गोलार्ध’ और उससे परे एक व्यापक भू-रणनीतिक महत्वाकांक्षा का हिस्सा है।
ऐसा इसलिए है, क्योंकि ग्रीनलैंड दो ऐसी सीमाओं पर स्थित है, जो जल्दी-जल्दी बदल रहे हैं, पहला गर्म होता आर्कटिक- जो इसे नौवहन मार्गों में तब्दील कर देगा, और दूसरा एक तेजी से सैन्यीकृत अंतरिक्ष।
जैसे-जैसे वैश्विक तनाव बढ़ रहा है, यह द्वीप भू-राजनीतिक दबाव का एक मापक बन गया है। इससे पता चलता है कि पुरानी अंतरराष्ट्रीय कानूनी व्यवस्था किस तरह कमजोर पड़ने लगी है।
इन सभी के केंद्र में पिटुफिक अंतरिक्ष ठिकाना है, जिसे पहले थुले एयरबेस के नाम से जाना जाता था। शीतयुद्ध के दौरान एक चौकी के रूप में इस्तेमाल यह बेस अब अमेरिकी सेना के अंतरिक्ष बल केंद्र का एक अहम हिस्सा है, जो मिसाइल का पता लगाने से लेकर जलवायु परिवर्तन पर नजर रखने तक हर चीज के लिए आवश्यक है।
अंतरिक्ष नियमों की अस्पष्टता
ट्रंप ने इस दलील का जमकर इस्तेमाल किया है। उन्होंने थूले की बार-बार प्रशंसा करते हुए इसे पृथ्वी के ऊपर होने वाली गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए सबसे महत्वपूर्ण परिसंपत्तियों में से एक बताया है और अमेरिका से इसे मजबूत करने के लिए ‘‘हर विकल्प पर विचार करने’’ का आग्रह किया है।
फिर चाहे बल प्रयोग से हो, पैसे के बल पर हो या बातचीत से, यह मूल संदेश नहीं बदला है कि ग्रीनलैंड, अमेरिका की आर्कटिक और अंतरिक्ष संबंधी महत्वाकांक्षाओं के केंद्र में है।
यह सिर्फ सैन्य निगरानी का मामला नहीं है। निजी कंपनियां रिकॉर्ड गति से रॉकेट प्रक्षेपित कर रही हैं, ऐसे में ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति ऐसे प्रक्षेपण के लिए अनुकूल परिस्थितियों का अति दुर्लभ अवसर प्रदान करती है।
उच्च अक्षांश वाले स्थान ध्रुवीय और सूर्य-तुल्यकालिक कक्षाओं में उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए आदर्श हैं। ग्रीनलैंड के विशाल खाली क्षेत्र और खुले समुद्री गलियारे इसे आर्कटिक प्रक्षेपण केंद्र के रूप में एक संभावित विकल्प बनाते हैं। उपलब्ध स्थानों की कम संख्या और पहुंच संबंधी समस्याओं के कारण वैश्विक प्रक्षेपण क्षमता सीमित होती जा रही है, ऐसे में यह द्वीप अचानक एक बहुमूल्य संपत्ति बन गया है।
लेकिन ग्रीनलैंड में अमेरिकी रुचि उस समय बढ़ रही है, जब युद्ध के बाद की ‘‘नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था’’ शांति और सुरक्षा बनाए रखने में तेजी से निष्प्रभावी साबित हो रही है।
अंतरिक्ष कानून आज विशेष रूप से खतरे में है। वर्ष 1967 की बाह्य अंतरिक्ष संधि दो महाशक्तियों (अमेरिका और सोवियत संघ) तथा कुछ ही उपग्रहों को ध्यान में रखकर की गयी थी, न कि निजी उपग्रहों के विशाल समूह, वाणिज्यिक चंद्र परियोजनाओं या क्षुद्रग्रह खनन के लिए।
इसके अलावा, यह भी कभी अनुमान नहीं लगाया गया था कि पृथ्वी पर स्थित थुले/पिटुफिक जैसे निगरानी स्थल यह तय करेंगे कि अंतरिक्ष कक्षा की निगरानी या उस पर प्रभुत्व कौन रख सकता है।
विभिन्न देश जैसे-जैसे सामरिक पकड़ मजबूत करने की होड़ में लगे हैं, संधि के मूल सिद्धांत धराशायी होने की कगार पर पहुंच रहे हैं। प्रमुख शक्तियां अब, स्थलीय और अंतरिक्ष, दोनों क्षेत्रों को वैश्विक साझा संसाधनों की बजाय नियंत्रण और रक्षा क्षेत्र के लिए रणनीतिक संपत्तियों के रूप में देखती हैं।
ग्रीनलैंड एक चेतावनी
ग्रीनलैंड विभाजन रेखा पर स्थित है। यदि अमेरिका इस द्वीप पर अपना नियंत्रण बढ़ाता है, तो वैश्विक अंतरिक्ष निगरानी क्षमताओं में उसका असमानुपातिक हिस्सा होगा। यह असंतुलन कई असहज प्रश्न खड़े करता है।
अंतरिक्ष एक वैश्विक साझा संसाधन के रूप में कैसे कार्य कर सकता है, जब इसकी देखरेख के लिए आवश्यक उपकरण कुछ ही हाथों में केंद्रित हों? क्या होगा जब पृथ्वी पर भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा सीधे अंतरिक्ष में फैल जाएगी? और जब पृथ्वी का इलाका अंतरिक्ष प्रभाव का प्रवेश द्वार बन जाए तो अंतरराष्ट्रीय कानून को किस प्रकार अनुकूलित होना चाहिए? कई पर्यवेक्षकों के लिए, स्थिति निराशाजनक है। उनका तर्क है कि अंतरराष्ट्रीय कानूनी व्यवस्था विकसित नहीं हो रही है, बल्कि क्षीण हो रही है।
आर्कटिक क्षेत्र में सहयोग को बढ़ावा देने वाला प्रमुख अंतर-सरकारी मंच, आर्कटिक परिषद, भू-राजनीतिक तनावों से पंगु हो गया है। संयुक्त राष्ट्र की बाह्य अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण उपयोग संबंधी समिति वाणिज्यिक नवाचारों के साथ तालमेल नहीं बिठा पा रही है। कई देशों में नए अंतरिक्ष कानून सामूहिक शासन की तुलना में संसाधन अधिकारों और रणनीतिक लाभ को अधिक प्राथमिकता दे रहे हैं।
इस संदर्भ में, ग्रीनलैंड केवल एक सामरिक परिसंपत्ति नहीं, बल्कि चेतावनी का संकेत है।
ग्रीनलैंडवासियों के लिए स्थिति बेहद गंभीर है। द्वीप का रणनीतिक महत्व उन्हें लाभप्रद स्थिति प्रदान करता है, लेकिन साथ ही उन्हें असुरक्षित भी बनाता है। आर्कटिक की बर्फ पिघलने और नए समुद्री मार्गों के उभरने से ग्रीनलैंड का भूराजनीतिक महत्व और भी बढ़ेगा।
यहां के लोगों को वैश्विक शक्तियों की महत्वाकांक्षाओं से जूझते हुए अपने राजनीतिक और आर्थिक भविष्य को संवारना होगा, जिसमें डेनमार्क से स्वतंत्रता की संभावना भी शामिल है।
एक राजनीतिक जिज्ञासा के रूप में जो शुरू हुआ था, अब एक गहरे बदलाव को उजागर करता है। आर्कटिक अंतरिक्ष पर शासन का अग्रिम मोर्चा बन रहा है, और इस विशाल बर्फीले क्षेत्र और इसके ऊपर से अंतरिक्ष प्रबंधन के लिए बनाए गए कानून और संधियां तालमेल बिठाने के लिए संघर्ष कर रही हैं।
पुराना थुले हवाई ठिकाना अब केवल एक ‘उत्तरी चौकी’ नहीं रह गया है, बल्कि यह अंतरिक्ष की कक्षा में जाने का एक रणनीतिक प्रवेश द्वार और ऊपर से राजनीतिक एवं सैन्य शक्ति के प्रदर्शन का एक साधन बन गया है।